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Gajab Facts

साल 2017 की वे तीन सबसे बेमतलब चीजें जिनके साथ दुनिया व्यस्त रही

आमतौर पर किसी साल को इस बात के लिए याद किया जाता है कि उसमें कौन से जरूरी बदलाव हुए जिनसे हमारा देश-दुनिया और बेहतर बनी हो. हालांकि यहां हम 2017 की उन तीन बेमतलब चीजों का जिक्र करने जा रहे हैं जिनका होना न तो किसी उपलब्धि में गिना जाएगा और न ही इनके होने से दुनिया में कोई अच्छा या बुरा फर्क महसूस किया जा सका. बावजूद इसके ये तीन चीजें दुनियाभर में चर्चित रहीं और लाखों-करोड़ों लोगों ने इन्हें अपनाया और अपना समय, ऊर्जा, पैसा और यहां तक कि कुछ ने तो इनमें से एक के चलते अपनी जिंदगी भी गंवा दी. चलिए जानते हैं, इस साल की वे तीन खास मगर बकवास कही जा सकने वाले चीजें क्या हैं –

 

फिजिट स्पिनर

 

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक फिजिट स्पिनर इस साल गूगल पर सबसे ज्यादा सर्च किए जाने शब्दों में से एक है. फिजिट स्पिनर एक फिरकीनुमा खिलौना है जिसे उंगलियों से पकड़कर घुमाया जाता है. यह कुछ हद तक बच्चों के खेलने वाले लट्टू या बेब्लेड की तरह होता है. आमतौर पर फिजिट स्पिनर के खिलाड़ी इसे सबसे ज्यादा देर तक घुमाने का कंपटीशन करते नजर आते हैं. यह खेल इस साल इतना लोकप्रिय हुआ कि न सिर्फ बच्चे बल्कि बड़े भी इसकी गिरफ्त में आ गए. नतीजतन फिजिट स्पिनर की पहुंच सड़क-दुकानों से लेकर कॉर्पोरेट ऑफिसों तक हो गई.

फिजिट स्पिनर की लोकप्रियता के पीछे तर्क दिया गया कि यह आपको ध्यान लगाने में मदद करता है. हालांकि यह बात किसी वैज्ञानिक तथ्य के आधार पर नहीं कही जा रही थी और न ही बाद में हुए कुछ छिटपुट प्रयोगों में यह बात साबित हो सकी. यहां तक कि बाद में अमेरिका के कुछ स्कूलों में फिजिट स्पिनर पर यह कहते हुए प्रतिबंध लगा दिया गया कि इसे खेलने के चक्कर में बच्चे क्लास में ध्यान नहीं लगा पाते.
इस दौरान बच्चों के खेलने का यह खिलौना कुछ लोगों के लिए स्टेटस सिंबल भी बन गया. इसके सहारे तमाम करतब दिखाने से लेकर अलग-अलग रंगों और डिजाइन वाले फिजिट स्पिनर का कलेक्शन करने का जुनून भी लोगों में देखा गया. यहां तक कि चौबीस कैरेट सोने या महंगे स्वरोस्की क्रिस्टल वाले स्पिनर भी बाजार में आए और साथ ही इनमें दिलचस्पी दिखाने वालों की भीड़ भी.

ब्लू व्हेल गेम

 

रूस से शुरू हुआ यह खतरनाक ऑनलाइन गेम कई देशों में पहुंचा और इस साल डेढ़ सौ से ज्यादा लोगों की मौत की वजह बना. ब्लू व्हेल दरअसल एक ऑनलाइन चैलेंज गेम था जिसे मनोविज्ञान के एक छात्र फिलिप बुदेकिन ने बनाया था. 21 साल के बुदेकिन के मुताबिक उसने यह गेम समाज से ‘कायर लोगों की सफाई’ करने के लिए बनाया है. ब्लू व्हेल गेम 50 लेवल रखे गए थे और हर लेवल को पार करने के लिए खिलाड़ी को एक खतरनाक काम करना होता था. जैसे – रात को बेवक्त जागना, अकेले कोई डरावनी फिल्म देखना या आधी रात को किसी खास जगह पर पहुंचना. आखिरी लेवल पर पहुंचने वाले खिलाड़ी को आत्महत्या करने का चैलेंज दिया जाता था. खिलाड़ी को ये टास्क ईमेल या सोशल मीडिया के जरिए एक कम्युनिटी के लोग बताया करते थे. हर टास्क खत्म करने के बाद खिलाड़ी को कलाई पर ब्लेड से एक खास निशान बनाना होता था जिसकी तस्वीर टास्क देने वाले यानी टास्क मास्टर को भेजी जाती थी. आखिरी लेवल पर पहुंचने तक ये सारे निशान मिलकर ब्लू व्हेल की आकृति बनाते थे यानी आखिरी कट इस आकृति को पूरा करता था.
ब्लू व्हेल एक अजीब तरह का मनोवैज्ञानिक खेल था जिसका टार्गेट अकेलापन महसूस करने वाले या स्मार्ट फोन को ही दुनिया मानने वाले लोग थे. ऐसे लोगों को यह खेल कुछ कर दिखाने की और अपने आप को किसी लायक साबित कर पाने एक छद्म संतुष्टि देता था. यही कारण था कि टीनएजर्स इसका सबसे ज्यादा शिकार बने. इसी वजह से बाद में भारत सहित कई देशों में इस खेल को प्रतिबंधित कर दिया.

 

सराहा एप

 

सोशल मीडिया पर बीच-बीच में ईमानदारी का बुखार चढ़ता रहता है और ऑनेस्टी, सीक्रेट सेऐट डॉट मी जैसे कई एप और वेबसाइट्स इस बात के उदाहरण हैं. इस बुखार ने इस साल सराहा एप के जरिए लोगों को अपनी गिरफ्त में लिया. पहले आई कई ऑनेस्टी एप्स की ही तरह इसकी खासियत यह थी कि आप बिना अपना नाम बताए सराहा यूजर को फीडबैक दे सकते थे.
सऊदी अरब के मूल निवासी ज़ैन अल अब्दीन तौफ़ीक़ द्वारा बनाया गया यह ऐप मूलतः एक वेबसाइट थी जो इसी साल फरवरी में लॉन्च की गई थी. इसका उद्देश्य था कंपनी में अपनी पहचान छुपाकर बॉस का फीडबैक देना. शुरुआती हफ्ते में ही इस पर करीब दो करोड़ से ज्यादा व्यूज आ चुके थे. इसलिए तौफ़ीक़ को लगा कि इसका दायरा बढ़ाया जा सकता है, लिहाजा जून तक उन्होंने सराहा का ऐप भी बनाकर तैयार कर दिया. यह इतना लोकप्रिय हुआ कि जुलाई आते-आते 30 से ज्यादा देशों में यह ऐपल के ऐप स्टोर से सबसे ज्यादा डाउनलोड किए जाने वाले ऐप्स में टॉप पर था.
सराहा की खासियत यह है कि इसकी वेबसाइट सराहा.कॉम (sarahah.com) पर जाकर लोग खुद को रजिस्टर कर सकते हैं. फिर इस प्रोफाइल लिंक को फेसबुक, स्नैपचैट वगैरह पर शेयर किया जा सकता है जिस पर जाकर सराहा यूजर के बारे में उनके दोस्त बिना पहचान बताए अपनी राय दे सकते हैं. संदेश भेजने वाले की पहचान गुप्त रखा जाना इस ऐप के सबसे बड़ी खूबी थी, लेकिन यही कुछ लोगों को इंटरनेट पर संवाद के मूल सिद्धांत को खत्म करती हुई लगी. इसके चलते इसका विरोध भी किया गया. पिछले दिनों सराहा पर जवाब देने का विकल्प भी जोड़ा गया है. हालांकि अब तो सराहा का भूत सोशल मीडिया के सर से उतर चुका है, लेकिन कहीं-कहीं पर लोग अब भी इसका इस्तेमाल करते दिख जाते हैं.

 

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