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प्रधानमंत्री के फलस्तीन दौरे का हाल जाने यहाँ

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भारत और फलस्तीन

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फलस्तीन के लिए एक प्रमुख विकास सहायता साझेदार के रूप में भारत की भूमिका को ध्यान में रखते हुए, दोनों पक्षों ने 10 फरवरी 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के बीच एक द्विपक्षीय बैठक के बाद, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में छह समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए।

इस दौरान राष्ट्रपति अब्बास ने शांति प्रक्रिया बरकरार रखने में भारत से समर्थन मांगा है। उन्होंने भारत-फिलिस्तीन संबंधों के विभिन्न विषयों पर चर्चा की।

समझौते

● बेथलेहम के बेत सहौर में 30 लाख डॉलर की लागत से एक भारत- फलस्तीन सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल की स्थापना के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

● दूसरा समझौता ज्ञापन महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए ‘तुराथी’ नामक भारत- फलस्तीन केंद्र के निर्माण के लिए किया गया, जिसकी लागत पांच करोड़ डॉलर है।

● एक अन्य समझौता ज्ञापन पांच लाख डॉलर की लागत से रामल्लाह में एक नेशनल प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना के लिए किया गया।

● तुबास प्रांत के तमनून गांव और मुथालथ अल शौहादा गांव में दो स्कूलों के निर्माण के लिए दो समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए, जिनकी लागत क्रमश: 11 लाख डॉलर और 10 लाख डॉलर है।

● अबू दीस में जवाहर लाल नेहरू स्कूल फॉर बॉयज पर एक अतिरिक्त मंजिल के निर्माण के लिए एक छठे एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए।

राष्ट्रपति अब्बास ने रामल्ला स्थित राष्ट्रपति परिसर ‘मुकाता’ में एक आधिकारिक समारोह में प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया। रामल्ला से ही फिलिस्तीनी सरकार संचालित होती है। मोदी फलस्तीन की आधिकारिक यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं।

वार्ता के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति अब्बास को आश्वासन दिया कि भारत फिलिस्तीनी जनता के हितों के प्रति वचनबद्ध है। उन्होंने कहा कि भारत को पश्चिम एशिया क्षेत्र में शांति और स्थिरता लौटने की उम्मीद है।

फलस्तीन

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फ़िलिस्तीन (अरबी: فلسطين‎) दुनिया का एक राज्यक्षेत्र है। यह इस क्षेत्र का नाम है जो लेबनान और मिस्र के बीच था के अधिकांश हिस्से पर इसराइल के राज्य की स्थापना की गई है। 1948 से पहले सभी क्षेत्र फ़िलिस्तीन कहलाता था। जो खिलाफ़त उस्मानिया में स्थापित रहा लेकिन बाद में अंग्रेजों और फ़्रांसीसियों ने इस पर कब्जा कर लिया। 1948 में यहाँ के अधिकांश क्षेत्र पर इस्राइली राज्य की स्थापना की गई। इसकी राजधानी बैतुल मुक़द्दस थी। पर 1967 में इसराइल ने कब्जा कर लिया। बैतुल मुक़द्दस को इस्राइली येरुशलम कहते हैं और यह शहर यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों तीनों के पास पवित्र है। मुसलमानों का क़िबला प्रथम यही है।

अगर आज के फिलस्तीन-इसरायल संघर्ष और विवाद को छोड़ दें तो मध्यपूर्व में भूमध्यसागर और जॉर्डन नदी के बीच की भूमि को फलीस्तीन कहा जाता था। बाइबल में फिलीस्तीन को कैन्नन कहा गया है और उससे पहले ग्रीक इसे फलस्तिया कहते थे। रोमन इस क्षेत्र को जुडया प्रांत के रूप में जानते थे।

फलस्तीन का इतिहास

तीसरी सहस्ताब्दि में यह प्रदेश बेबीलोन और मिस्र के बीच व्यापार के लिहाज से एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरा। फिलीस्तीन क्षेत्र पर दूसरी सहस्त्राब्दि में मिस्रियों तथा हिक्सोसों का राज्यथा। लगभग इसा पूर्व 1200 में हजरत मूसा ने यहूदियों को अपने नेतृत्व में लेकर मिस्र से फिलीस्तीन की तरफ़ कूच किया। हिब्रू (यहूदी) लोगों पर फिलिस्तीनियों का राज था। पर सन् 1000 में इब्रानियों (हिब्रू, यहूदी) ने दो राज्यों की स्थापना की (अधिक जानकारी के लिए देखें – यहूदी इतिहास) – इसरायल और जुडाया। ईसापूर्व 700 तक इनपर बेबीलोन क्षेत्र के राज्यों का अधिकार हो गया। इस दौरान यहूदियों को यहाँ से बाहर भेजा गया। ईसापूर्व 550 के आसपास जब यहाँ फ़ारस के हख़ामनी शासकों का अधिकार हो गया तो उन्होंने यहूदियों को वापस अपने प्रदेशों में लौटने की इजाजत दे दी। इस दौरान यहूदी धर्म पर जरथुस्त धर्म का प्रभाव पड़ा।

सिकन्दर के आक्रमण (332 ईसापूर्व) तक तो स्थिति शांतिपूर्ण रही पर उसके बाद रोमनों के शासन में यहाँ दो विद्रोह हुए – सन् 66 और सन् 132 में। दोनों विद्रोहों को दबा दिया गया। अरबों का शासन सन् 636 में आया। इसके बाद यहाँ अरबों का प्रभुत्व बढ़ता गया। इस क्षेत्र में यहूदी, मुस्लिम और ईसाई तीनों आबादी रहती थी।

पार्शिया साम्राराज्य कि स्थापना के बाद, यहुदियो (जयुस्) को अपनी धार्मिक पुस्तक के अनुसार अपने देश इस्रैल जाने कि अनुमति मिल गयी। इस ही समय यहूदियो ने अपना दूसरा मन्दिर जेरुशलम में स्थापित किया।

 

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