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3 बड़ी कंपनियां जिन्होंने 2017 में भारत में सबसे ज्यादा हलचल मचाई

यूं तो भारतीय वित्तीय वर्ष की गणना एक अप्रैल से लेकर 31 मार्च तक होती है, लेकिन आम जुबान में साल का मतलब जनवरी से दिसंबर ही होता है. तो जाते जाते इस साल की उन तीन कंपनियों के बारे में चर्चा कर लें जो कई कारणों से सबसे ज़्यादा चर्चा में रहीं.

 

रिलायंस जिओ

जिसकी आंधी ने बाकी सब के तंबू उखाड़ दिए

कुछ दिन पहले मुकेश अंबानी ने भारती एयरटेल के चेयरमैन सुनील मित्तल को नसीहत दी थी कि उन्हें बच्चों की तरह रोना बंद कर देना चाहिए. पिछले साल सितंबर में जब रिलायंस जिओ की शुरुआत हुई तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह नई नवेली कंपनी ऐसा तूफ़ान खड़ा कर देगी जो समूचे कॉरपोरेट जगत को झकझोर देगा. आज रिलायंस जिओ की वजह से हिंदुस्तान डेटा का सबसे बड़ा बाज़ार बन गया है. आंकड़ों के मुताबिक़ आज इस बाजार में जियो की 14 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सेदारी है.
डेढ़ साल से भी कम समय में इतनी बड़ी हिस्सेदारी यकीनन क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. इसके पीछे कई कारण हैं. अन्य टेलिकॉम कंपनियों के आधे-अधूरे नेटवर्क, सुस्त डाटा स्पीड और कॉल ड्रॉप्स ने देश में इतना हाहाकर मचा दिया था कि तंग आकर सरकार और न्यायालय ने कई बार कंपनियों के खिलाफ कड़े आदेश दिए थे. वहीं रिलायंस जिओ ने काफ़ी कम समय में करीब एक लाख 20 हजार टावरों का जाल बिछाकर एक तेज़ और साफ़ सुथरा नेटवर्क दिया था.
जिओ का असर बाज़ार पर कुछ इस तरह हुआ कि सारे समीकरण ही बदल गए. उसका असर टेलिकॉम कंपनियों पर ही नहीं, बल्कि बैंकों पर भी पड़ा. बैंकों का टेलिकॉम कंपनियों पर कुल चार लाख करोड़ रुपये क़र्ज़ है. घटते मुनाफ़े ने इस क़र्ज़ की अदायगी को भी संकट में डाल दिया. है. ऊपर से सरकार द्वारा आईयूसी दरों में कमी ने बाकी कंपनियों की मुश्किलें बढ़ा दी है. जानकार इसके पीछे रिलायंस जिओ का ही हाथ मानते हैं.
मुकेश अंबानी के जिओ प्रेम का असर उसकी मुख्य कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज पर भी भारी पड़ा है. जिओ की वजह से रिलायंस इंडस्ट्रीज पर पिछले 15 सालों की तुलना में सबसे ज्यादा कर्ज हो गया है. वहीं जिओ ने अगस्त में 4 जी फीचर फ़ोन भी बाज़ार में उतार दिए हैं. हालांकि, इन फ़ोनों का बाजार पर विशेष असर नहीं पड़ा है पर भारतीय ग्रामीण इलाकों में काफ़ी हलचल मची हुई है.
कुल मिलाकर, टेलिकॉम सेक्टर में यह सबसे उथल-पुथल वाला साल रहा है और इस उथल-पुथल की सबसे बड़ी वजह रही है रिलायंस जिओ.

पतंजलि आयुर्वेद

 

किसी ने दस साल पहले यह नहीं सोचा होगा कि कोई एक बाबाजी आयेंगे और योग सिखाते- सिखाते ऐसी कंपनी का निर्माण कर देंगे जो दुनिया भर के प्रबंधन स्कूलों में केस स्टडी बन जायेगी. जहां औसत तौर पर एफ़एमसीजी सेक्टर में कंपनियां सालाना औसतन 10 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज कर रही हैं, वहीं पतंजलि आयुर्वेद ने लगातार दो वित्त वर्षों से 100 फीसदी से ऊपर की वृद्धि दर्ज की है. 2016-2017 में पतंजलि का व्यवसाय 5000 करोड़ से बढ़कर 10561 करोड़ रु हो गया है. पतंजलि घी और उसका टूथपेस्ट दंतकांति आज घर-घर की रसोई और बाथरूम में नज़र आने लगे हैं. ताजा आंकड़े देखें तो दंत कांति और पतंजलि घी की बाज़ार में हिस्सेदारी क्रमशः 14 और 13.9 फीसदी की है. वहीं शैंपू बाज़ार में केश कांति 7.8 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ ताल ठोक रहा है.
यूनिलीवर, नेस्ले, कोलगेट-पामोलिव और आईटीसी जैसी एफएमसीजी कंपनियां कई दशकों से भारत के बाज़ार में थीं. उन्होंने भारतीयों के जीने के तरीकों में खासा बदलाव किया. मसलन एक ज़माने में जब लोग दातून या कोयले से दांत साफ करते थे, या फिर पायरिया के मरीज़ सरसों के तेल और नमक से, तब टूथपेस्ट हमारे लिए नयी चीज़ थी. ठीक उसी प्रकार खाने में हमने या तो घानी का तेल इस्तेमाल किया था या फिर देशी घी. वनस्पति घी हमारे बाजार को एफएमसीजी कंपनियों की देन है. जानकारों के मुताबिक पतंजलि आयुर्वेद ने भारतीय समाज की पारंपरिक मान्यताओं को नए अंदाज़ में पेश किया और ग्राहकों को यकीन दिलाया कि ‘पुराना अच्छा था.’
बाबा रामदेव मीडिया पतंजलि आयुर्वेद की कामयाबी के लिए मीडिया को भी श्रेय देते हैं. एक साक्षात्कार में उनका कहना था, ‘हमने तो पतंजलि आयुर्वेद को एक से 10 प्रतिशत ही बनाया है, मीडिया ने इसे 90 फीसदी बनाया है.’ पतंजलि के लिए बाबा रामदेव और बालकृष्ण से बेहतर और बड़ा ब्रांड एम्बेसडर कोई हो ही नहीं सकता था.
इस साल सितंबर में ख़बर आई कि कंपनी फ़ूड पार्क के निर्माण के लिए किसी बैंक से 1000 करोड़ रु लेने का मन बना रही है. रेटिंग एजेंसी आईक्रा के हिसाब से कंपनी के मज़बूत विपणन सिस्टम और कम लागत की वजह से इसकी वित्तीय हालात अच्छी है. खबर यह भी है कि अप्रैल 2018 तक पतंजलि अब कपड़ा व्यवसाय के क्षेत्र में उतर जायेगी. कंपनी इस बाजार में 30 फीसदी हिस्सेदारी का लक्ष्य लेकर चल रही है. यह तो समय ही बताएगा कि बाबा रामदेव इसमें भी सफल होते हैं या नहीं पर फ़िलहाल तो उनकी वजह से एफएमसीजी कंपनियों के पसीने छूटे हुए हैं.

पेटीएम

जिसने लेन-देन का तरीका ही बदल दिया

आठ नवंबर, 2016 को विजय शेखर शर्मा ने जब प्रधानमंत्री का राष्ट्र को संबोधन सुना होगा तो उन्हें किसी अन्य व्यक्ति की तरह यकीन नहीं होगा कि उनकी क़िस्मत इतनी जल्दी बदल जाएगी. डीमॉनेटाईज़ेशन यानी विमुद्रीकरण और आम भाषा में कहें तो नोटबंदी आम इन्सान के लिए कैसी रही, यह कोई बताने की बात नहीं रही. पर वन97 की सह कंपनी पेटीएम के लिए तो यह किसी वरदान से कम नहीं थी.
बीती 27 दिसंबर को कंपनी ने घोषणा की अब उसके पास 10 करोड़ ग्राहक हो गए हैं जिन्होंने गूगल के प्लेस्टोर से पेटीएम की एप्लीकेशन को डाउनलोड कर लिया है. वैसे कंपनी के पास कुल 26 करोड़ ग्राहक हैं. हिंदुस्तान में किसी ई-पेमेंट एप्लीकेशन के लिए यह सबसे बड़ा आंकड़ा है.
बकौल कंपनी के सह संस्थापक विजय शेखर शर्मा जब वे एक बार चीन गए थे तो उन्होंने वहां सब्ज़ी बेचने वाले दुकानदारों को मोबाइल के ज़रिये ग्राहकों से पैसे लेते देखा. यहीं से उन्हें पेटीएम की स्थापना की प्रेरणा मिली. पेटीएम का अंग्रेजी में मतलब है ‘पेमेंट थ्रू मोबाइल’ यानी मोबाइल के ज़रिये पेमेंट.

यहीं से पेटीएम की शुरुआत 2013 में हुई थी. चार साल में ही इसने असाधारण सफर तय कर लिया है. विजय शेखर इस ई कॉमर्स क्रांति का श्रेय ख़ुद न लेकर फ्लिपकार्ट के सचिन बंसल को देते हैं.
मार्च 2015 में रतन टाटा ने इसमें निवेश किया था|

इस साल सितंबर में भीम यूपीआई को पेटीएम से जोड़ना भी इसके लिए क्रांतिकारी रहा है. इसी साल विजय शेखर फोर्ब्स द्वारा जारी अरबपतियों की सूची में छठवें नंबर पर रहे हैं. उनकी सफलता का एक पैमाना यह भी है कि दिल्ली के लुटियेंस ज़ोन, जहां सुनील मित्तल, नवीन जिंदल, बिड़ला सरीखे लोग रहते हैं, वहां उन्होंने 82 करोड़ रूपये में 6000 वर्ग फ़ीट जगह अपने घर के लिए ख़रीदी है.

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