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विवादित फ़िल्म पद्मावत देखने से पहले एक बार जरूर जाने कौन था अलाउद्दीन ख़िलजी

विवादित फ़िल्म पद्मावत देखने से पहले एक बार जरूर जाने कौन था अलाउद्दीन ख़िलजी

ऐसे तो भारत में कई फिल्म विवादित बनी हैं। पर पद्मावत इस सीरीज में कुछ ख़ास है।
बॉलीवुड विश्वभर में सबसे बड़ा फिल्म उद्योग है। यहां हर साल लगभग हजार से भी अधिक फिल्में बनती है। इन फिल्मों में कुछ हिट होती है तो कुछ फ्लॉप, वहीं कुछ ऐसी भी होती है जो अपना काम चला जाती है। इन सब के बावजूद बहुत सी ऐसी भी फिल्में है जो बनती तो हैं पर किसी न किसी कारण हम उसे देख नहीं पाते। ऐसी फिल्मों पर सेंसर बोर्ड प्रतिबंध लगा देता है। इन प्रतिबंधित फिल्मों के पीछे कई कारण होता है। अश्लील भाषा, अश्लील दृश्यों के अलावा कई फिल्में धार्मिक कारणों, लिंग भेदभाव जैसे कई और भी कारण यह विवादों में फंस जाती है।

पद्मावत क्या है?

पद्मावत हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत सूफी परम्परा का प्रसिद्ध महाकाव्य है। इसके रचनाकार मलिक मोहम्मद जायसीहैं।दोहा और चौपाई छन्द में लिखे गए इस महाकाव्य की भाषा अवधी है।

यह हिन्दी की अवधी बोली में है और चौपाई, दोहों में लिखी गई है। चौपाई की प्रत्येक सात अर्धालियों के बाद दोहा आता है और इस प्रकार आए हुए दोहों की संख्या 653 है।

जायसी सूफी संत थे और इस रचना में उन्होंने नायक रतनसेन और नायिका पद्मिनी की प्रेमकथा को विस्तारपूर्वक कहते हुए प्रेम की साधना का संदेश दिया है। रतनसेन ऐतिहासिक व्यक्ति है, वह चित्तौड़ का राजा है, पदमावती उसकी वह रानी है जिसके सौंदर्य की प्रशंसा सुनकर तत्कालीन सुल्तान अलाउद्दीन उसे प्राप्त करने के लिये चित्तौड़ पर आक्रमण करता है और यद्यपि युद्ध में विजय प्राप्त करता है तथापि पदमावती के जल मरने के कारण उसे नहीं प्राप्त कर पाता है। इसी ऐतिहासिक अर्ध ऐतिहासिक कथा के पूर्व रतनसेन द्वारा पदमावती के प्राप्त किए जाने की व्यवस्था जोड़ी गई है, जिसका आधार अवधी क्षेत्र में प्रचलित हीरामन सुग्गे की एक लोककथा है।

इसी लोक कथा को परदे पे अवतरित करने जा रहे हैं डायरेक्टर संजय लीला भंसाली उनकी इस फ़िल्म का नाम भी पद्मावत है। इस फ़िल्म में शाहिद कपूर नायक राजा रतन सिंह का किरदार निभा रहे है। और दीपिका पादुकोण नायिका महारानी पद्मिनी का किरदार निभा रहे हैं। और इस फ़िल्म में खलनायक अलाउद्दीन ख़िलजी का किरदार निभा रहे हैं रणवीर सिंह। यह फ़िल्म साल 2018 की सबसे विवादित फ़िल्म है जिसके प्रदर्शन से कुछ संगठनो में असंतोष है। इसके बाबजूद ये फ़िल्म 25 जनवरी को रिलीज़ होने के लिए तैयार है। और देश में कई लोग हैं जिन्हें इसका बेसब्री से इन्तेजार भी है। अगर आपने भी इस फ़िल्म को देखने की तयारी कर ली है तो जाने से पहले आप जानना जरूर चाहेंगे की कौन था अलाउद्दीन ख़िलजी।
तो हम आपको बताएँगे की अलाउद्दीन ख़िलजी कौन था और भारत के इतिहास में अलाउद्दीन ख़िलजी की क्या भूमिका रही।

कौन था अलाउद्दीन ख़िलजी?

अलाउद्दीन खिलजी का वास्तविक नाम अली गुरशास्प था अलाउद्दीन ख़िलजी दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश का दूसरा शासक था। वो एक विजेता था। और उसने अपना साम्राज्य दक्षिण में मदुरै तक फैला दिया था। इसके बाद इतना बड़ा भारतीय साम्राज्य अगले तीन सौ सालों तक कोई भी शासक स्थापित नहीं कर पाया था। अलाउद्दीन ख़िलजी अपने मेवाड़ चित्तौड़ के विजय अभियान के बारे में भी प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि अलाउद्दीन ख़िलजी चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी की सुन्दरता पर मोहित था। इस बात का वर्णन मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी रचना पद्मावत में किया है।

राजा कैसे बना?

उसके समय में उत्तर पूर्व से मंगोल आक्रमण भी हुए। अलाउद्दीन ने उसका भी डटकर सामना किया।अलाउद्दीन ख़िलजी के बचपन का नाम अली ‘गुरशास्प’ था। जलालुद्दीन खिलजी के तख्त पर बैठने के बाद उसे ‘अमीर-ए-तुजुक’ का पद मिला। मलिक छज्जू के विद्रोह को दबाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण जलालुद्दीन ने उसे कड़ा-मनिकपुर की सूबेदारी सौंप दी। भिलसा, चंदेरी एवं देवगिरि के सफल अभियानों से प्राप्त अपार धन ने उसकी स्थिति और मज़बूत कर दी। इस प्रकार उत्कर्ष पर पहुँचे अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या धोखे से 22 अक्टूबर 1296 को खुद से गले मिलते समय अपने दो सैनिकों (मुहम्मद सलीम तथा इख़्तियारुद्दीन हूद) द्वारा करवा दी। इस प्रकार उसने अपने सगे चाचा जो उसे अपने औलाद की भांति प्रेम करता था के साथ विश्वासघात कर खुद को सुल्तान घोषित कर दिया और दिल्ली में स्थित बलबन के लालमहल में अपना राज्याभिषेक 22 अक्टूबर 1296 को सम्पन्न करवाया।

क्या किया अलाउद्दीन ने?

अलाउद्दीन के दरबार में अमीर खुसरों तथा हसन निजामी जैसे उच्च कोटि के विद्धानों को संरक्षण प्राप्त था। स्थापत्य कला के क्षेत्र में अलाउद्दीन खिलजी ने वृत्ताकार ‘अलाई दरवाजा’ अथवा ‘कुश्क-ए-शिकार’ का निर्माण करवाया। अलाउद्दीन द्वारा बनाया गया ‘अलाई दरवाजा’ शुरूआती तुर्की कला का एक सर्वश्रेष्ठ नमूना माना जाता है। इसने सीरी के किले, हजार खम्भा महल का निर्माण किया।

शाशन कैसे किया?

राज्याभिषेक के बाद उत्पन्न कठिनाईयों का अलाउद्दीन सफलता पूर्वक सामना किया। अलाउद्दीन ने कठोर शासन व्यवस्था के अन्तर्गत अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करना आरम्भ किया। अलाउद्दीन ने अपनी शुरूआती सफलताओं से प्रोत्साहित होकर अलाउद्दीन ने ‘सिकन्दर द्वितीय’ (सानी) की उपाधि ग्रहण कर इसका उल्लेख अपने सिक्कों पर करवाया। अलाउद्दीन ने विश्व-विजय एवं एक नवीन धर्म को स्थापित करने के अपने विचार को अपने मित्र एवं दिल्ली के कोतवाल ‘अलाउल मुल्क’ के समझाने पर त्याग दिया। यद्यपि अलाउद्दीन ने ख़लीफ़ा की सत्ता को मान्यता प्रदान करते हुए ‘यामिन-उल-ख़िलाफ़त-नासिरी-अमीर-उल-मोमिनीन’ की उपाधि ग्रहण की, किन्तु उसने ख़लीफ़ा से अपने पद की स्वीकृत लेनी आवश्यक नहीं समझी। उलेमा वर्ग को भी अपने शासन कार्य में हस्तक्षेप नहीं करने दिया। उसने शासन में इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों को प्रमुखता न देकर राज्यहित को सर्वोपरि माना। अलाउद्दीन ख़िलजी के समय निरंकुशता अपने चरम सीमा पर पहुँच गयी। अलाउद्दीन ख़िलजी ने शासन में न तो इस्लाम के सिद्धान्तों का सहारा लिया और न ही उलेमा वर्ग की सलाह ली।

चित्तौड़ आक्रमण एवं मेवाड़ विजय

मेवाड़ के शासक राणा रतन सिंह थे , जिनकी राजधानी चित्तौड़ थी। चित्तौड़ का क़िला भौगोलिक दृष्टिकोण से बहुत सुरक्षित स्थान पर बना हुआ था। इसलिए यह क़िला अलाउद्दीन की निगाह में चढ़ा हुआ था। कुछ इतिहासकारों ने अमीर खुसरो के रानी शैबा और सुलेमान के प्रेम प्रसंग के उल्लेख आधार पर और ‘पद्मावत की कथा’ के आधार पर चित्तौड़ पर न के आक्रमण का कारण रानी पद्मिनी के अनुपन सौन्दर्य के प्रति उसके आकर्षण को ठहराया है। अन्ततः 28 जनवरी 1303 ई. को सुल्तान अलाउद्दीन चित्तौड़ के क़िले पर अधिकार करने में सफल हुआ। राणा रतन सिंह युद्ध में शहीद हुये और उनकी पत्नी रानी पद्मिनी ने अन्य स्त्रियों के साथ जौहर कर लिया, ये चर्चा का विषय है। अधिकतर इतिहासकार पद्मिनी को काल्पनिक पात्र मानते हैं। किले पर अधिकार के बाद सुल्तान ने लगभग 30,000 राजपूत वीरों का कत्ल करवा दिया। उसने चित्तौड़ का नाम ख़िज़्र ख़ाँ के नाम पर ‘ख़िज़्राबाद’ रखा और ख़िज़्र ख़ाँ को सौंप कर दिल्ली वापस आ गया। चित्तौड़ को पुनः स्वतंत्र कराने का प्रयत्न राजपूतों द्वारा जारी था। इसी बीच अलाउदीन ने ख़िज़्र ख़ाँ को वापस दिल्ली बुलाकर चित्तौड़ दुर्ग की ज़िम्मेदारी राजपूत सरदार मालदेव को सौंप दी। अलाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात् गुहिलौत राजवंश के हम्मीरदेव ने मालदेव पर आक्रमण कर 1321 ई. में चित्तौड़ सहित पूरे मेवाड़ को आज़ाद करवा लिया। इस तरह अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद चित्तौड़ एक बार फिर पूर्ण स्वतन्त्र हो गया।

अलाउद्दीन की मृत्यु कैसे हुई?

जो जैसा करता है वो वैसा भरता है उसी तरह जलोदर रोग से ग्रसित अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपना अन्तिम समय अत्यन्त कठिनाईयों में व्यतीत किया और 2 जनवरी 1316 ई. को इसकी जीवन-लीला समाप्त हो गई।

तो दोस्तों आपको हमारी पोस्ट कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताएं।

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