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ये हैं भारत के अद्भुत किले आपको एक बार जाना चाहिए

ये हैं भारत के अद्भुत किले आपको एक बार जाना चाहिए

प्राचीनकाल में विशालकाय महल और मंदिर बनते थे। नगर को चारों ओर से सुरक्षित करने के लिए परकोटे बनते थे अर्थात चारों ओर विशालकाय पत्थरों की दीवारें होती थीं। और उन दीवारों में चारों दिशाओं में 4 दरवाजे होते थे। मध्यकाल में विदेशी आक्रमण के चलते भव्य किले बनाए जाने लगे। किले को ‘दुर्ग’ कहा जाता है।

ऐसे किले हमारे गौरवशाली इतिहास और युद्ध को दर्शाते हैं। इनमें से ‍कुछ किलों को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में भी शामिल किया गया है। आज हम आपको भारत के कुछ ऐसे किलों के बारे में बता रहे हैं जिनका इतिहास जानकार आप हैरान रह जाएंगे।

ग्वालियर का किला

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ग्वालियर का क़िला ग्वालियर शहर का प्रमुखतम स्मारक है। यह किला ‘गोपांचल’ नामक पर्वत पर स्थित है। किले के पहले राजा का नाम सूरज सेन था, जिनके नाम का प्राचीन ‘सूरज कुण्ड’ किले पर स्थित है। इसका निर्माण 8वीं शताब्दी में मान सिंह तोमर ने किया था। विभिन्न कालखण्डों में इस पर विभिन्न शासकों का नियन्त्रण रहा। गुजरी महल का निर्माण रानी मृगनयनी के लिए कराया गया था। वर्तमान समय में यह दुर्ग एक पुरातात्विक संग्रहालय के रूप में है। इस दुर्ग में स्थित एक छोटे से मन्दिर की दीवार पर शून्य (०)उकेरा गया है जो शून्य के लेखन का दूसरा सबसे पुराना ज्ञात उदाहरण है। यह शून्य लगभग 1500 वर्ष पहले उकेरा गया था।
लाल बलुए पत्थर से बना यह किला शहर की हर दिशा से दिखाई देता है। एक ऊंचे पठार पर बने इस किले तक पहुंचने के लिये दो रास्ते हैं। एक ‘ग्वालियर गेट’ कहलाता है एवं इस रास्ते सिर्फ पैदल चढा जा सकता है। गाडियां ‘ऊरवाई गेट’ नामक रास्ते से चढ सकती हैं और यहां एक बेहद ऊंची चढाई वाली पतली सड़क से होकर जाना होता है। इस सडक़ के आर्सपास की बडी-बडी चट्टानों पर जैन तीर्थकंरों की अतिविशाल मूर्तियां बेहद खूबसूरती से और बारीकी से गढी गई हैं। किले की तीन सौ पचास फीट उंचाई इस किले के अविजित होने की गवाह है। इस किले के भीतरी हिस्सों में मध्यकालीन स्थापत्य के अद्भुत नमूने स्थित हैं। पन्द्रहवीं शताब्दी में निर्मित गूजरी महल उनमें से एक है जो राजा मानसिंह और गूजरी रानी मृगनयनी के गहन प्रेम का प्रतीक है। इस महल के बाहरी भाग को उसके मूल स्वरूप में राज्य के पुरातत्व विभाग ने सप्रयास सुरक्षित रखा है किन्तु आन्तरिक हिस्से को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया है जहां दुर्लभ प्राचीन मूर्तियां रखी गई हैं जो कार्बन डेटिंग के अनुसार प्रथम शती ईस्वी की हैं। ये दुर्लभ मूर्तियां ग्वालियर के आसपास के इलाकों से प्राप्त हुई हैं।

चित्तोड़गढ़ का किला

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चित्तौड़गढ़ राजस्थान का एक शहर है। यह शूरवीरों का शहर है जो पहाड़ी पर बने दुर्ग के लिए प्रसिद्ध है। चित्तौड़गढ़ की प्राचीनता का पता लगाना कठिन कार्य है, किंतु माना जाता है कि महाभारत काल में महाबली भीम ने अमरत्व के रहस्यों को समझने के लिए इस स्थान का दौरा किया और एक पंडित को अपना गुरु बनाया, किंतु समस्त प्रक्रिया को पूरी करने से पहले अधीर होकर वह अपना लक्ष्य नहीं पा सका और प्रचंड गुस्से में आकर उसने अपना पांव जोर से जमीन पर मारा जिससे वहां पानी का स्रोत फूट पड़ा, पानी का यह कुंड भीम ताल कहा जाता है। बाद में यह स्थान मौर्य अथवा मूरी राजपूतों के अधीन आ गया, इसमें भिन्न-भिन्न राय हैं कि यह मेवाड़ शासकों के अधीन कब आया, किंतु राजधानी को उदयपुर ले जाने से पहले 1568 तक चित्तौड़गढ़ मेवाड़ की राजधानी रहा। यहां पर रोड वंशी राजपूतों ने बहुत समय राज किया यह माना जाता है गुलिया वंशी बप्पा रावल ने 8वीं शताब्दी के मध्य में अंतिम सोलंकी राजकुमारी से विवाह करने पर चित्तौढ़ को दहेज के एक भाग के रूप में प्राप्त किया था, बाद में उसके वंशजों ने मेवाड़ पर शासन किया जो 16वीं शताब्दी तक गुजरात से अजमेर तक फैल चुका था।

अजमेर से खंडवा जाने वाली ट्रेन के द्वारा रास्ते के बीच स्थित चित्तौरगढ़ जंक्शन से करीब २ मील उत्तर-पूर्व की ओर एक अलग पहाड़ी पर भारत का गौरव, राजपूताने का सुप्रसिद्ध चित्तौड़गढ़ का किला बना हुआ है। समुद्र तल से 1338 फीट ऊँची भूमि पर स्थित 500 फीट ऊँची एक विशाल ह्मवेल आकार में, पहाड़ी पर निर्मित्त इसका दुर्ग लगभग 3 मील लंबा और आधे मील तक चौड़ा है। पहाड़ी का घेरा करीब ८8मील का है तथा यह कुल 609 एकड़ भूमि पर बसा है।

गढ़कुढार का किला

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गढ कुंढार का दुर्ग और उसके भग्नावशेष गढ़-कुंडार मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में स्थित एक गाँव है। इस गाँव का नाम यहां स्थित प्रसिद्ध दुर्ग(या गढ़) के नाम पर पढ़ा है। यह किला उस काल की न केवल बेजोड़ शिल्पकला का नमूना है बल्कि उस खूनी प्रणय गाथा के अंत का गवाह भी है, जो विश्वासघात की नींव पर रची गई थी। गढ कुढार का प्राचीन नाम गढ कुरार है।परिचय गढ़ कुढार का किला मऊरानीपुर से 50 कि०मी० की दूरी पर बना हुआ है। यह 11 वीं शताब्दी में जुझौती प्रदेश की राजधानी था। गढ़ कुंडार उस समय उत्तर भारत का एक बड़ा शहर था। सन 1182 ई० में महाराज खेत सिंह खंगार ने चंदेलोंके समय से आबाद इस सैनिक मुख्यालय के स्थान पर अजेय दुर्गम दुर्ग का निर्माण करवाया था। घने जंगलों और पहाड़ों के बीच बना यह किला दूर से तो दिखाई देता है किन्तु जैसे जैसे इसके नजदीक पहुँचते हैं यह दिखाई देना बंद हो जाता है। आक्रमण की द्रष्टि से यह पूर्ण सुरक्षित है अतः इसे दुर्गुम दुर्ग कहा जाता है। यह किला उत्तर भारत की सबसे प्राचीन ईमारत है। यह पहाड़ों की ऐसी ऊंचाई पर बना है कि तोपों के गोले इसे नहीं तोड़ सकते थे लेकिन इस किले से बहुत दूर तक दुश्मन को देखकर उसे आसानी से मारा जा सकता था। हस्तिपथ द्वारा इस किले तक आसानी से पहुंचा जा सकता है सिंह द्वार के बाहर दो चबूतरे हैं जिन्हें दीवान चबूतरा कहते है। सिंहद्वार की ऊंचाई लगभग 20 फुट है तथा लम्बाई 80 फुट है। सिंहद्वार से लगा हुआ परकोटा राजमहल को चारोंतरफ से घेरे है जिसकी मोटाई लगभग 6 फुट है। सिंह द्वार को पार करने पर सिंहपौर है इसके बाद तोप खाना है जहाँ राजाओं के समय तोपें रखी जाती थीं। राज महल के बाहर एक घुडसाल है जहाँ राजा के घोड़े बांधे जाते थे। इस घुडसाल के 11 दरवाजे हैं तथा यह 18 फुट चौड़ी और 100 फ़ुट लम्बी है। इसके सामने एक चक्की लगी है जिससे चूना पीसने का काम होता था। इसी घुडसाल के सामने बना हुआ है भव्य राजमहल जिसके आठ खंड है। इसके तीन खंड अन्दर जमीन में हैं तथा चार खंड ऊपर हैं। राजमहल का प्रवेश द्वार पार करने के बाद करने के बाद राजमहल के कक्ष और सीढियाँ है तथा आगे जाने पर भव्य आँगन जिसके चारों तरफ कमरे और दालान बनी हुई हैं। महल का आंतरिक भाग काफी बड़ा और वर्गाकार है। महल में राजा रानी का कक्ष , राजकुमारों केकक्ष , राजा का दीवाने आम और बंदी गृह भी बने हुए हैं। महल के आँगन में हनुमान जी का एक मंदिर था जो अब टूट गया है। और हनुमान जी गिद्धवाहिनी देवी जी के मंदिर में चले गए हैं। आँगन में ही एक विशाल वेदी बनी हुयी है जहाँ राजा महापूजा करता था। राजकुमारी केशर दे का जौहर स्तम्भ भी आँगन में रखा हुआ है। महल के नीचे के तल से एक सुरंग महल के बाहर कुंए तक जाती है इस कुंए को जौहर कुआं भी कहते हैं। क्योंकि जब खंगार राजा और मोहम्मद तुगलक के बीच लड़ाई हुयी और कुंडार के राजा युद्ध में मारे गए तब राजमहल की रानियों और राजकुमारी केशर दे ने इसी कुंए में आग जलाकर अपने प्राणों की आहुति दी थी। राजमहल के बाद गढ़ कुंडार में गिद्ध वाहिनी देवी का मंदिर, सिंदूर सागर ताल, गजानन माता मंदिर, मुडिया महल , खजुआ बैठक सिया की रावर भी दर्शनीय स्थल हैं। गढ़ कुंडार में खंगार राजवंश के संस्थापक महाराजा खेत सिंह खंगार की जयंती 27 दिसम्बर को प्रति वर्ष मध्य प्रदेश सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है।

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