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भारत में बनने जा रही है अब तक की सबसे लंबी सड़क सुरंग।

  1. भारत में बनने जा रही है अब तक की सबसे लंबी सड़क सुरंग।

भारत सरकार ने जोजिला दर्रा के पास जोजिला सड़क बनाने का निश्चय किया है। सरकार ने श्रीनगर से लेह के दुर्गम सड़क मार्ग को आसान बनाने वाली रणनीतिक के रूप से अहम जोजिला सुरंग को मंजूरी दे दी है सात साल में बनकर तैयार होने वाली जोजिला सड़क की लंबाई 14.5 किलोमीटर है। और इसके बनने में आने वाला खर्च करीब 6800 करोड़ रुपये होगा। ऐसा अनुमान है।
जोजिला सड़क सुरंग श्रीनगर-कारगिल-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित जोजिला दर्रा के पास बनेगी। इसकी समुद्र तल से ऊंचाई 11,578 फ़ीट होगी। जैसा की हम जानते हैं हर साल सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी व हिमस्खलन के कारण लेह-लद्दाख क्षेत्र का जम्मू-श्रीनगर से संपर्क पूरी तरह से टूट जाता है। जोजिला सड़क सुरंग बनने के बाद इस मार्ग पर साल के 365 दिन चौबीसों घंटे वाहनों की आवाजाही हो सकेगी। जोजिला सड़क सुरंग पाकिस्तान की सीमा के बिल्कुल पास होने के कारण यह सड़क सुरंग रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण साबित होगी। जोजिला सड़क सुरंग बनने के बाद सेना के लिए भी आवागमन में आसानी हो जाएगी।
बीते वुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्री मंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने इस परियोजना को मंजूरी दे दी है। नितिन गडकरी ने बताया कि यह सड़क सुरंग एनएच-1(A) पर बनेगी जिससे सीधे जुड़ने के कारण दूरी काफी कम हो जायेगी। जोजिला सड़क सुरंग भारत की सबसे लंबी सड़क सुरंग होगी।

सुरंग कैसी होती है

भूमि के अंदर क्षैतिज मार्ग, जो ऊपरी चट्टान या मिट्टी हटाए बिना ही बनाया जाए, सुरंग (Tunnel) कहलाता है। कोई चट्टान या भूखंड तोड़ने के उद्देश्य से विस्फोटक पदार्थ भरने के लिए कोई छेद बनाना भी ‘सुरंग लगाना’ कहलाता है। प्राचीन काल में सुरंग मुख्यतया तात्पर्य किसी भी ऐसे छेद या मार्ग से होता था जो जमीन के नीचे हो, चाहे वह किसी भी प्रकार बनाया गया हो, जैसे कोई नाली खोदकर उसमें किसी प्रकार की डाट या छत लगाकर ऊपरी मिट्टी से भर देने से सुरंग बन जाया करती थी। किंतु बाद में इसके लिए जलसेतु (यदि वह पानी ले जाने के लिए है), तलमार्ग या छादित पथ नाम अधिक उपयुक्त समझे जाने लगे। इनके निर्माण की क्रिया को सुरंग लगाना नहीं, बल्कि सामान्य खुदाई और भराई ही कहते हैं।

बाद में चौड़ी करके सुरंग बड़ी करने के उद्देश्य से प्रारंभ में छोटी सुरंग लगाना अग्रचालन कहलाता है। खानों में छोटी सुरंगें गैलरियाँ, दीर्घाएँ या प्रवेशिकाएँ कहलाती हैं। ऊपर से नीचे सुरंगों तक जाने का मार्ग, यदि यह ऊर्ध्वाधर है तो कूपक और यदि तिरछा हो तो ढाल या ढालू कूपक कहलाता है।

प्राकृतिक बनी हुई सुरंगें भी बहुत देखी जाती हैं। बहुधा दरारों से पानी नीचे जाता है, जिसमें चट्टान का अंश भी घुलता है। इस प्रकार प्राकृतिक कूपक और सुरंगें बन जाती हैं। अनेक नदियाँ इसी प्रकार अंतभौम बहती हैं। अनेक जीव भूमि में बिल बनाकर रहते हैं, जो छोटे-छोटे पैमाने पर सुरंगें ही हैं।

सुरंगों का इतिहास

प्रकृति में इस प्रकार सुरंगों के प्रचुर उदाहरण देखकर निस्संदेह यह कल्पना की जा सकती है कि मनुष्य भी सुरंगें खोदने की दिशा में अति प्राचीन काल से ही अग्रसर हुआ होगा-सर्वप्रथम शायद निवासों और मकबरों के लिए, फिर खनिज पदार्थ निकालने के उद्देश्य से और अंतत: जल प्रणालियों, नालियों आदि सभ्यता की अन्य आवश्यकताओं के लिए। भारत में अति प्राचीन गुफा मंदिरों के रूप में मानव द्वारा विशाल पैमाने पर सुरंगें लगाने के उदाहरण प्रचुर परिमाण में मिलते हैं। इनमें से कुछ गुफाओं के मुख्य द्वारों की उत्कृष्ट वास्तुकला आधुनिक सुरंगों के मुख्यद्वारों के आकल्पन में शिल्पियों का मार्गदर्शन करने की क्षमता रखती है। अजंता, इलोरा और एलीफैंटा की गुफाएँ सारे संसार के वास्तुकला विशारदों का ध्यान आकर्षित कर चुकी हैं।

मध्य पूर्व में निमरोद के दक्षिणी पूर्वी महल की डाटदार नाली साधारण भूमि के भीतर सुरंग लगाने का प्राचीन उदाहरण है। ईटं की डाट लगी 4.5 मी और 3.6 मी एक सुरंग फरात नदी के नीचे मिली है। अल्जीरिया में, स्विट्जरलैंड में और जहाँ कहीं भी रोमन लोग गए थे, सड़कों, नालियों और जल प्राणियों के लिए बनी हुई सुरंगों के अवशेष मिलते हैं।

बारूद का आविष्कार होने से पहले सुरंगें बनाने की प्राचीन विधियों में कोई महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई थी। 17वीं शती के उत्कीर्ण चित्रों में सुरंग बनाने की जो विधियाँ-प्रदर्शित हैं, उनमें केवल कुदाली, छेनी, हथौड़ी का प्रयोग और अग्रचालन के लिए नरम चट्टान तोड़ने के उद्देश्य से लकड़ियों की आग जलाना ही दिखाया गया है। संवातन के लिए आगे की ओर कपड़े हिलाकर हवा करने और कूपकों के मुख पर तिरछे तख्ते रखने का उल्लेख भी मिलता है। रेलों के आगमन से पहले सुरंगें प्राय: नहरों के लिए ही बनाई जाती थीं और इनमें से कुछ तो बहुत प्राचीन हैं। रेलों के आने पर सुरंगों की आवश्यकता आम हो गई। संसार भर में शायद 5,000 से भी अधिक सुरंगें रेलों के लिए ही खोदी गई हैं। अधिकांश पर्वतीय रेलमार्ग सुरंगों में ही होकर जाता है। मेक्सिको रेलवे में 105 किमी लंबे रेलपथ में 21 सुरंगें और दक्षिणी प्रशांत रेलवे में 32 किमी की लंबाई में ही 11 सुरंगें हैं, जिनमें एक सर्पिल सुरंग भी हैं। संसार की सबसे लंबी लगातार सुरंग न्यूयार्क में 1917.24 ई. में कैट्सकिल जलसेतु के विस्तार के लिए बनाई गई थी। यह शंडकेन सुरंग 288 किमी लंबी है। कालका शिमला रेलपथ पर साठ मील लंबाई में कई छोटी सुरंगें हैं, जिनमें सबसे बड़ी की लंबाई 1137 मी है।

विश्व की कुछ प्रमुख सुरंग

विश्व की अन्य महत्वपूर्ण सुरंगें माउंट सेनिस 14 किमी (1857-71 ई.), सेंट गोथार्ड 15 किमी (1872-81 ई.), ल्यूट्शबर्ग (1906-11 ई.), यूरोप के आल्प्स पर्वत में कनाट (1913-16 ई.) कनाडा के रोगर्स दर्रे में मोफट 10 किमी (1923-28 ई.) एवं न्यूकैस्केड (1925-28 ई.) संयुक्त राष्ट्र अमरीका के पर्वतों में हैं। सुरंग निर्माण का बहुत महत्वपूर्ण काम जापान में हुआ है। वहाँ सन्‌ 1918-30 में अटायो और पिशीमा के बीच टाना सुरंग खोदी हुई, जो दो पर्वतों और एक घाटी के नीचे से होकर जाती है। इसकी अधिकतम गहराई 395 मी और घाटी के नीचे 182 मी है। भारत में सड़क के लिए बनाई गई सुरंग जम्मू-श्रीनगर सड़क पर बनिहाल दर्रे पर है, जिसकी लंबाई 2790 मी है। यह समुद्रतल से 2184 मी. ऊपर है तथा दुहरी है, जिससे ऊपर और नीचे जाने वाली गाड़ियाँ अलग-अलग सुरंग से जा सकें।

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