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भारत के वैज्ञानिकों ने विकसित की मलेरिया के परजीवी को मारने की दवा अब होगा मलेरिया का सफाया यहाँ देखें मलेरिया का उपचार

भारत के वैज्ञानिकों ने विकसित की मलेरिया के परजीवी को मारने की दवा अब होगा मलेरिया का सफाया यहाँ देखें मलेरिया का उपचार

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हैदराबाद विश्वविद्यालय की एक शोध टीम ने एक दवा विकसित की है जो कि मैलेरिया के कारक प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम परजीवी को कुशलता से मारता है।

विश्वविद्यालय से जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि हैदराबाद विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रोफेसर प्रदीप पाइक के नेतृत्व में एक शोध समूह द्वारा बहुलक (पॉलीमर) आधारित इस नैनोमेडीसिन को विकसित किया गया है।

प्रोफेसर पाइक ने कहा है कि नया फॉर्मूला लाल रक्त कोशिकाओं में प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम संक्रमण को मारने में कुशल था और साथ ही उन्होंने जोड़ा कि अब पशु परीक्षण के लिए अब दवा का इस्तेमाल किया जा सकता है।

प्रोफेसर पाइक वर्तमान में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (बीएचयू), वाराणसी में बायोमेडिकल इंजीनियरिंग स्कूल के एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि मलेरिया, मानव जाति के खिलाफ सबसे घातक बीमारियों में से एक है जोकि प्रति वर्ष 212 मिलियन लोगों को संक्रमित करती है और सालाना 4,29,000 मौतों का कारण बनती है।

मलेरिया

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मलेरिया या दुर्वात एक वाहक-जनित संक्रामक रोग है जो प्रोटोज़ोआ परजीवी द्वारा फैलता है। यह मुख्य रूप से अमेरिका, एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों के उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधी क्षेत्रों में फैला हुआ है। मलेरिया को आमतौर पर गरीबी से जोड़ कर देखा जाता है किंतु यह खुद अपने आप में गरीबी का कारण है तथा आर्थिक विकास का प्रमुख अवरोधक है।

मलेरिया सबसे प्रचलित संक्रामक रोगों में से एक है तथा भंयकर जन स्वास्थ्य समस्या है। यह रोग प्लाज्मोडियम गण के प्रोटोज़ोआ परजीवी के माध्यम से फैलता है।

केवल चार प्रकार के प्लाज्मोडियम (Plasmodium) परजीवी मनुष्य को प्रभावित करते है जिनमें से सर्वाधिक खतरनाक प्लाज्मोडियम फैल्सीपैरम (Plasmodium falciparum) तथा प्लाज्मोडियम विवैक्स (Plasmodium vivax) माने जाते हैं, साथ ही प्लाज्मोडियम ओवेल (Plasmodium ovale) तथा प्लाज्मोडियम मलेरिये (Plasmodium malariae) भी मानव को प्रभावित करते हैं। इस सारे समूह को ‘मलेरिया परजीवी’ कहते हैं।

मलेरिया के लक्षण

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मलेरिया के लक्षणों में शामिल हैं- ज्वर, कंपकंपी, जोड़ों में दर्द, उल्टी, रक्ताल्पता (रक्त विनाश से), मूत्र में हीमोग्लोबिन और दौरे। मलेरिया का सबसे आम लक्षण है अचानक तेज कंपकंपी के साथ शीत लगना, जिसके फौरन बाद ज्वर आता है। 4 से 6 घंटे के बाद ज्वर उतरता है और पसीना आता है। पी. फैल्सीपैरम के संक्रमण में यह पूरी प्रक्रिया हर 36 से 48 घंटे में होती है या लगातार ज्वर रह सकता है; पी. विवैक्स और पी. ओवेल से होने वाले मलेरिया में हर दो दिन में ज्वर आता है, तथा पी. मलेरिये से हर तीन दिन में।

मलेरिया का उपचार

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मलेरिया के कुछ मामले आपातकालीन होते है तथा मरीज को पूर्णतया स्वस्थ होने तक निगरानी मे रखना अनिवार्य होता है, किंतु अन्य प्रकार के मलेरिया में ऐसा आवश्यक नहीं हैं, इलाज बहिरंग विभाग में किया जा सकता है। उचित इलाज होने पर मरीज बिलकुल ठीक हो जाता है। कुछ लक्षणों का उपचार सामान्य दवाओं से किया जाता है, साथ में मलेरिया-रोधी दवाएँ भी दी जाती है। ये दवाएं दो प्रकार की होती हैं- पहली जो प्रतिरोधक होती हैं और रोग होने से पहले लिए जाने पर रोग से सुरक्षा करती हैं तथा दूसरी वे जिनका रोग से संक्रमित हो जाने के बाद प्रयोग किया जाता है। अनेक दवाएँ केवल प्रतिरोध या केवल उपचार के लिए इस्तेमाल होती हैं, जबकि अन्य कई दोनों तरह से प्रयोग में लाई जा सकती हैं। कुछ दवाएँ एक-दूसरे के प्रभाव को बढ़ाती हैं और इनका प्रयोग साथ में किया जाता है। प्रतिरोधक दवाओं का प्रयोग अक्सर सामूहिक रूप से ही किया जाता है।

कुनैन पर आधारित अनेक औषधियों को मलेरिया का अच्छा उपचार समझा जाता है। इसके अतिरिक्त आर्टिमीसिनिन जैसी औषधियाँ, जो आर्टिमीसिया एन्नुआ  नामक पौधे से तैयार की जाती है, मलेरिया के इलाज में प्रभावी पाई गई हैं। कुछ अन्य औषधियों का प्रयोग भी मलेरिया के विरुद्ध सफल हुआ है। कुछ औषधियों पर प्रयोग जारी है। दवा के चुनाव में सबसे प्रमुख कारक होता है उस क्षेत्र में मलेरिया परजीवी किन दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर चुका है। अनेक दवाएँ जिनका प्रयोग पहले मलेरिया के विरुद्ध सफल समझा जाता था आजकल सफल नहीं समझा जाता क्यों कि मलेरिया के परजीवी धीरे धीरे उनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्राप्त कर चुके हैं।

रोकथाम कैसे करें

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मच्छरों के प्रजनन स्थलों को नष्ट करके मलेरिया पर बहुत नियंत्रण पाया जा सकता है। खड़े पानी में मच्छर अपना प्रजनन करते हैं, ऐसे खड़े पानी की जगहों को ढक कर रखना, सुखा देना या बहा देना चाहिये या पानी की सतह पर तेल डाल देना चाहिये, जिससे मच्छरों के लारवा सांस न ले पाएं। इसके अतिरिक्त मलेरिया-प्रभावित क्षेत्रों में अकसर घरों की दीवारों पर कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाता है। अनेक प्रजातियों के मच्छर मनुष्य का खून चूसने के बाद दीवार पर बैठ कर इसे हजम करते हैं। ऐसे में अगर दीवारों पर कीटनाशकों का छिड़काव कर दिया जाए तो दीवार पर बैठते ही मच्छर मर जाएगा, किसी और मनुष्य को काटने के पहले ही। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में छिडकाव के लिए लगभग 12 दवाओं को मान्यता दी है। इनमें डीडीटी के अलावा परमैथ्रिन और डेल्टामैथ्रिन जैसी दवाएँ शामिल हैं, खासकर उन क्षेत्रों मे जहाँ मच्छर डीडीटी के प्रति रोधक क्षमता विकसित कर चुके है।

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सभी पाठकों से अनुरोध है कुछ भी इलाज लेने से पहले अच्छे विशेषज्ञ से सलाह अवश्य ले।

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